World Geography Notes In Hindi {*भाग –3: पर्वत, पठार, चट्टान}

0 1,907

पर्वत

सामान्यतया पृथ्वी के धरातल से 6 सौ मीटर से अधिक ऊँचे उठे हुए भू-भाग को पर्वत कहते हैं । किन्तु विश्व के कई पठार ऐसे हैं, जो इससे भी अधिक ऊँचे हैं, किन्तु वे पर्वत नहीं हैं । उदाहरण के लिए तिब्बत का पठार समुद्र तल से 48 सौ मीटर ऊँचा है, किन्तु वह पर्वत नही है । धरातल के 27 प्रतिशत भाग में पर्वत हैं । पर्वतों के निम्न स्वरूप होते हैं –
(1) पर्वत कटक ;(Mountain Riedg) लंबी संकरी, ऊँची पहाडि़यों की श्रृंखला पर्वत कटक कहलाती है । इनका निर्माण चट्टानों के पटल के मुड़ने से होता है । ये विशेष रूप से उस स्थान पर बनते हैं, जहाँ पटल के एक ओर घाटी तथा दूसरा अपेक्षाकृत ऊँचा उठा हुआ भाग होता है ।
(2) पर्वत श्रेणी ;(Mountain Range) यह पहाड़ और पहाडि़यों की विस्तृत श्रृंखला होती है, जिसमें अनेक कटक, शिखर और घाटियाँ शामिल होती हैं । उल्लेखनीय है कि एक ही पर्वत में कई श्रेणियाँ हो सकती हैं; जैसे – हिमालय की श्रेणियाँ ।
इन श्रेणियों की उत्त्पत्ति तो एक ही युग में होती है, किन्तु इनकी चट्टानों के बनावट में अन्तर होता है । इसके अतिरिक्त पर्वतों के स्वरूपों में पर्वतमाला, पर्वत तंत्र, पर्वत वर्ग तथा पर्वत शिखर आदि आते हैं। पर्वत शिखर पर्वत का सर्वोच्च भाग होता है, जो नुकीला, गुम्बदाकार या पिरामिड के आकार का हो सकता है।
पठार
पठार ऊँचाईयों में पर्वतों से कम तथा मैदानों से अधिक ऊँचे होते हैं । सामान्यतया 5 सौ फीट से अधिक ऊँचे भाग को पठार कहते हैं । वस्तुतः इनकी मुख्य विशेषता यह है कि ये मैदानों की अपेक्षा थोड़े से अधिक ऊँचे होते हैं । पृथ्वी के संभवतः 33 प्रतिशत भाग पर पठार हैं ।
पठारों का निर्माण –
·         किसी क्रिया के कारण पृथ्वी के एक बड़े हिस्से का अपने आसपास की तुलना में ऊँचा उठ जाने के कारण ।
·          ज्वालामुखी के बाद लावा का अधिक मात्रा में एक स्थान पर जमा हो जाने के कारण ।
·          पर्वत बन जाने के दौरान किसी कारण से उसी पर्वत का कुछ हिस्सा अधिक ऊपर न उठ पाये ।
·         पर्वत जब घिसकर नीचा हो जाए ।
·         हवा किसी स्थान पर लगातार मिट्टी के कणों को जमा करने लगे । आदि-आदि ।
कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य –
  • · तिब्बत विश्व का सबसे ऊँचा पठार है, जो समुद्र तल से औसतन 16 हजार फीट ऊँचा है ।
  • तिब्बत का पठार क्षेत्र की दृष्टि से भी विश्व का सबसे बड़ा पठार है । इसका क्षेत्रफल 7.8 लाख वर्गमील तक है ।
  •  जम्मू-कश्मीर में हिम नदियों के जमाव से छोटे-छोटे पठार बनते हैं । इन पठारों को मर्ग कहा जाता है । सोजमर्ग और गुलमर्ग ऐसे ही पठार हैं ।
  • गढ़वाल का पठार भी हिम नदी के निक्षेप से बना है ।
  • विश्व के सबसे ऊँचे पठार अन्तरपर्वतीय पठार हैं ।
  • पर्वतों की तलहटी पर स्थित पठार खड़ी पदीय पठार कहलाते हैं । इन पठारों के एक ओर ऊँचे पर्वत तो दूसरी ओर मैदान या समतल होते हैं । भारत का शिलाँग का पठार ऐसा ही पठार है।
  •  गुम्बदाकार पठारों की रचना ज्वालामुखी प्रक्रिया से होती है । छोटा नागपुर के पठार की रचना ऐसे ही हुई है ।
  • समुद्र के तटों के साथ-साथ फैले पठार तटीय पठार कहलाते हैं । भारत का कोरोमण्डल तट तटीय पठार का अच्छा उदाहरण है ।
  • तिब्बत का पठार सपाट पठार है ।संयुक्त राज्य अमेरिका का कोलेरेडो पठार मरुस्थलीय पठार का उदाहरण है । इसे युवा पठार भी कहा जाता है ।
  • भारत में राँची का पठार जीर्ण या वृद्ध पठार कहलाता है ।
  • जीर्ण या वृद्ध पठार की पहचान उस पर उपस्थित पत्थर ‘मेसा’ से होती है । वस्तुतः जब नष्ट हो रहे पठारों पर कहीं-कहीं कठोर चट्टान के टुकड़े टीले के रूप में बचे रह जाते है, तो उन्हें मेसा या बूटा कहा जाता है ।
  • जब वृद्ध पठार अकस्मात युवा अवस्था में आ जाते हैं, तो उन्हें ‘पुनर्युवनीत पठार’ कहा जाता है । राँची का ‘‘पार प्रदेश’’ ऐसा ही पठार है ।
चट्टान
वस्तुतः ; जिन्हें हम स्थल मण्डल कहते हैं, वे मूलतः शैल मण्डल ही हैं । पृथ्वी की ठोस परत को स्थल मण्डल कहा जाता है जो लगभग 100 किलोमीटर मोटी है । पृथ्वी को बनाने में 95 प्रतिशत योगदान चट्टानों का है । ये चट्टानें मुख्यतः खनिज पदार्थों से बने होते हैं । पृथ्वी पर जितनी चट्टानें पाई जाती हैं । उनमें 6 प्रकार के खनिजों की प्रमुखता होती है । ये खनिज हैं – क्वाटर्ज, अभ्रक, फेल्सबार, बायरोकसीन्स, एक्मीबोल्स तथा ओलिवीन ।
बनावट की प्रक्रिया के आधार पर पृथ्वी पर पाये जाने वाले समस्त चट्टानों को तीन भागों में विभाजित किया गया है –
(1) आग्नेय चट्टान
(2) अवसादी चट्टान, तथा
(3) रूपान्तरित चट्टान ।
(1) आग्नेय चट्टान – अंग्रेजी में इन्हें ‘इंग्नीयस रॉक्स’ कहा जाता है । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इनके निर्माण में अग्नि का योगदान प्रमुख होता है । इनका निर्माण या तो ज्वालामुखी से निकलकर पृथ्वी पर फैले हुए लावा के ठण्डे हो जाने से होता है या फिर पृथ्वी के अन्दर ही धधक रहे मैग्मा के ठण्डे हो जाने से । उदाहरण के लिए बेसाल्ट काले रंग की आग्नेय चट्टान है, जो पृथ्वी के ऊपर लावा के ठण्डा होने से बनी है । जबकि ग्रेनाइट मोटे दानों वाली आग्नेय चट्टान है, जो पृथ्वी के अन्दर मैग्मा के धीरे-धीरे ठण्डा होने से बनी है ।
आग्नेय चट्टानों की निम्न विशेषताएँ होती हैं –
  •  ये चट्टानें कठोर, रवेदार तथा परतहीन होती हैं ।
  • इन चट्टानों के बीच जीवाश्म नहीं पाये जाते ।
  • चूँकि इनमें पानी का प्रवेश कम हो पाता है, इसलिए इनमें रासायनिक अपक्षय की क्रिया भी बहुत कम होती है ।
  • इन चट्टानों में जोड़ पाये जाते हैं ।
  • चूँकि इन चट्टानों का निर्माण ही ज्वालामुखी से होता है, इसलिए ये चट्टानें ज्वालामुखी क्षेत्र में विशेष रूप से पाई जाती हैं ।
  • पृथ्वी के ऊपर लावा के ठण्डे होने से बनने वाली चट्टानों के कण भी छोटे-छोटे होते है , क्योंकि लावा अपेक्षाकृत जल्दी ठण्डा हो जाता है । जबकि इसके विपरीत पृथ्वी के अन्दर का मैग्मा धीरे-धीरे ठण्डा होता है, जिसके कारण इन चट्टानों के रवे मोटे हो जाते हैं ।
(2) अवसादी चट्टान – जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इन चट्टानों का निर्माण प्राचीन चट्टानों के टुकड़ों, जीवों के अवशेष, खनिज पदार्थों तथा अन्य वस्तुओं के अवसादों से होता है । हवा, पानी आदि तत्त्व जब लगातार इन वस्तुओं को बहाकर एक जगह पर इकठे  करते जाते हैं, तो बाद में ताप और दबाव के कारण यह एकत्र अवसाद चट्टान का रूप ले लेता है । उदाहरण के लिए बलुआ पत्थर बालु के कणों से बनता है, जो प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे से जुड़ गये हैं । खडि़या करोड़ों छोटे-छोटे जीवों के छोटे-छोटे केल्शियम कार्बोनेट के टुकड़ों से मिलकर बना है ।
इन चट्टानों की मुख्य विशेषताएँ हैं:-
  •  चूंकि अवसादी चट्टानें अवसादों के जमाव से बनते हैं, इसीलिए इन चट्टानों में परतें पाई जाती हैं। अतः इन्हें परतदार चट्टानें भी कहा जाता है ।
  • ये चट्टानें संगठित, असंगठित अथवा ढीली, किसी भी प्रकार की हो सकती हैं।
  •  चूँकि ये चट्टानें कणों की सघनता की दृष्टि से कमजोर होती हैं इसलिए इनमें अपरदन का प्रभाव शीघ्र होता है ।
  •  बालू का पत्थर, चीका मिट्टी, चूने का पत्थर, कोयला, शैल, खडिया़ तथा नमक की चट्टानों का निर्माण पृथ्वी के अन्दर अवसादों के निक्षेप से होता है ।
  •  गर्म एवं शुष्क प्रदेशों में वायु के द्वारा भी अवसादी चट्टानों का निर्माण होता है । लोयस इसका उदाहरण है ।
  •  ग्लेशियर के अपरदन से भी अवसादी चट्टानें बनती हैं । हिमोढ (मोरेन) इसी तरह की चट्टान है ।
(3) रूपान्तरित चट्टान – इन्हें कायान्तरित चट्टानें भी कहते हैं । ये चट्टानें ताप और दबाव के कारण नया रूप ग्रहण कर लेती हैं । उदाहरण के लिए चूने के पत्थर संगमरमर में तथा बालुका पत्थर का क्वार्टजाइट में बदल जाना । इसी प्रकार स्लेट तथा नीस भी रूपान्तरित चट्टानें हैं, जो क्रमशः चीका और ग्रेनाइट से परिवर्तित होती हैं । इन्हें परिवर्तित चट्टानें भी कहा जा सकता है।
इनकी निम्न विशेषताएँ हैं:-
  •  अवसादी और आग्नेय चट्टानें रूप बदलकर कायान्तरित चट्टानें बन जाती हैं ।
  •  कभी-कभी रूपान्तरित चट्टानों का भी रूपान्तरण हो जाता है ।
  •  जिस प्रकार धरातल के नीचे मैग्मा में समाकर अवसादी चट्टानों से आग्नेय चट्टान बन सकती हैं ठीक उसी प्रकार रुपान्तरित चट्टानों से भी आग्नेय या अवसादी चट्टान बन सकती हैं । कहने का अर्थ यह कि कोई भी चट्टान अन्य प्रकार का रूप और आकार ग्रहण कर सकती है । करोड़ों वर्षों से रूपान्तरण का यह क्रम जारी है।
भौतिक परिवर्तन करने वाली शक्तियाँ
जिन शक्तियों के परिणामस्वरुप पृथ्वी के धरातल पर परिवर्तन होता है, उन्हें भौतिक परिवर्तन करने वाली शक्तियाँ कहा जाता है । ये परिवर्तन दो प्रकार के होते हैं । या तो पृथ्वी पर नये स्वरूपों का निर्माण हो जाता है; जैसे कि झील तथा पहाड़ों का बनना । या फिर पृथ्वी पर बनी हुई आकृतियाँ नष्ट हो जाती हैं; जैसे भूकम्प आदि के कारण पहाड़ों का धँस जाना ।
मुख्य रूप से दो शक्तियाँ होती हैं, जो पृथ्वी के धरातल पर रचना और विनाश करती हैं । इन्हें अन्तर्जात शक्तियाँ तथा बहिर्जात शक्तियाँ कहा जाता है ।
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, पृथ्वी के आन्तरिक भागों में सक्रिय शक्तियों को अन्तर्जात शक्तियाँ कहते हैं । इन्हें निर्माणकारी शक्तियाँ भी कहा जाता है, क्योंकि इनके कारण पृथ्वी पर अनेक नये रूपों का निर्माण होता है । उदाहरण के लिए भूपृष्ठ पर तनाव या संकोच के कारण वलयों या परतों का निर्माण हो जाना । ये ही आगे चलकर मोड़दार पर्वतों का रूप ले लेते हैं । इसी प्रकार भूकम्प तथा ज्वालामुखी के विस्फोट से पृथ्वी के अन्दर के तरल मैग्मा के बाहर आकर जमने से अनेक नई आकृतियाँ बनती हैं । जब ज्वालामुखी का मुख सूखकर फैल जाता है, तब उसमें पानी भरने से नये झील का निर्माण हो जाता है ।
बाह्यजात शक्तियाँ उन्हें कहते हैं, जो पृथ्वी के धरातल पर सक्रिय रहती हैं , और हमें दिखाई देती है । सच तो यह है कि अन्तर्जात शक्तियों के कारण पृथ्वी पर जब कुछ रूपों का निर्माण हो जाता है, तो उससे धरातल पर विषमता आ जाती है । बाह्यजात शक्तियाँ इसी विषमता को समाप्त करने का काम करती रहती हैं । चूँकि इनका मुख्य काम धरातल के रूपों में तोड़-फोड़ करके उसे समाप्त करने का रहता है, इसलिए इन्हें विध्वंसकारी शक्ति भी कहा जाता है । बहता हुआ पानी, हवा, हिमनदी, समुद्र की तरंगें तथा भूमिगत जल आदि इसी तरह की शक्तियाँ है  जो लगातार स्थल रूपों की काँट-छाँट और घिसाई करते रहते हैं ।
काँट-छाँट, घिसाई आदि करके स्थल रुपों को क्षीण बनाने की यह प्रक्रिया ‘अनाच्छादन’ कहलाती है । अनाच्छादन में उन सभी साधनों के कार्य को शामिल किया जाता है, जिनसे धरातल के किसी भाग का विनाश या हानि हो ।
घसाई और काँट-छाँट के द्वारा तैयार हुए ये छोटे-छोटे कण जब हवा और पानी के द्वारा ले जाकर किसी एक स्थान पर जमा कर दिये जाते हैं, तो उसे ‘निक्षेपण या अपरदन’ कहते हैं ।
बाह्यजात शक्तियाँ अपना काम तीन अन्य शक्तियों के सहयोग से करती हैं । सहयोग देने वाली ये तीन शक्तियाँ हैं – सूर्य का ताप, पृथ्वी की गुरुत्त्वाकर्षण शक्ति तथा पृथ्वी की घूणन शक्ति ।

Download Pdf (हिन्दी में)

[better-ads type=”banner” banner=”223″ campaign=”none” count=”2″ columns=”1″ orderby=”rand” order=”ASC” align=”center” show-caption=”1″][/better-ads]

दोस्तों अगर आपको किसी भी प्रकार का सवाल है या ebook की आपको आवश्यकता है तो आप निचे comment कर सकते है. आपको किसी परीक्षा की जानकारी चाहिए या किसी भी प्रकार का हेल्प चाहिए तो आप comment कर सकते है. हमारा post अगर आपको पसंद आया हो तो अपने दोस्तों के साथ share करे और उनकी सहायता करे. आप हमसे Facebook Page या Whatsapp Group से भी जुड़ सकते है Daily updates के लिए.

Disclaimer: The content of SarkariNaukriHelp.com is provided for information and educational purposes only. We are not owner of the any PDF Material/Books/Notes/Articles published in this website. No claim is made as to the accuracy or authenticity of the PDF Material/Books/Notes/Articles of the website. In no event will this site or owner be liable for the accuracy of the information contained on this website or its use.

SarkariNaukriHelp.com provides freely available PDF Material/Books/Notes/Articles on the Internet or other resources like Links etc.This site does not take any responsibility and legal obligations due to illegal use and abuse of any service arises due to articles and information published on the website. No responsibility is taken for any information that may appear on any linked websites.

If any query mail us at [email protected]

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. AcceptRead More