World Geography Notes For UPSC – वायु का दाब | वायु दाब का वितरण | हवाएँ

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प्रिय पाठकों, विश्व का भूगोल की आज की श्रंखला – 14 में आज SarkarNaukriHelp आप सब छात्रों के लिए वायु का दाब | हवाएँ टाँपिक से सम्बंधित बहुत ही महत्वपूर्ण “World Geography Notes” शेयर कर रहा है. यह नोट्स UPSC Mains को  ध्यान में रख कर बनाया गया है आज बदलते हुए पैटर्न को देखते हुए “world Geography Notes for UPSC” अभ्यर्थीयों के लिए मददगार साबित होगा। इस World Geography Notes में आप सभी छात्रों को पूर्व में आयोजित विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के Facts को ध्यान में रख कर संग्रहित किया गया है।

वायु का दाब

वायुमण्डल मूलतः गैसों का मिश्रण है, जिसमें जलवाष्प और धूल के कण शामिल होते हैं । यद्यपि यह वायु भारयुक्त होती है, लेकिन जन्म से ही अभ्यस्त होने के कारण हमें उसका अहसास नहीं होता । वायु के भार के कारण पृथ्वी पर जो दबाव पड़ता है, उसे वायु दाब कहा जाता है । इस प्रकार वायुमण्डलीय दबाव का अर्थ है – किसी भी स्थान और समय पर वहाँ की हवा के स्तम्भ का भार ।

हवा के इस दबाव को जिस यंत्र से मापा जाता है, उसे ‘बेरोमीटर’ कहते हैं ।

वायु दाब ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ कम होता जाता है, जबकि तापमान बढ़ने के साथ-साथ घटता जाता है । यदि हवा मे जलवाष्प की मात्रा अधिक होती है, तो दबाव कम हो जाता है और जलवाष्प कम होने से दबाव बढ़ जाता है ।

वायु दाब का वितरण

पृथ्वी के किसी भी स्थान पर वायु का दाब हमेशा एक जैसा नहीं होता । इसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है । ठीक इसी प्रकार पृथ्वी पर वायु का वितरण भी एक समान नहीं होता ।

वायु का दाब दो प्रकार का होता है – उच्च वायु दाब तथा निम्न वायु दाब । इस आधार पर पृथ्वी पर वायु दाब की चार पेटियों की पहचान की गई हंै, जो निम्न हैं –

  • विषुवत रेखीय निम्न वायु दाब कटिबन्ध

इस विषुवत रेखा के समीप पाँच अंश अक्षांश तक माना जा सकता है । इस पेटी पर वर्षभर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं । इसके कारण ठण्डी हवा गर्म होकर ऊपर उठती है और ऊपर की ठण्डी हवा भारी होने के कारण नीचे आ जाती है । नीचे आने पर वह फिर से गर्म होकर ऊपर जाती है । यह क्रम वर्षभर चलता रहता है । इसलिए यहाँ वायु दाब कम रहता है । इस क्षेत्र में धरातल पर भी हवा लगभग गतिमान और शान्त होती है । इसलिए इस क्षेत्र को ‘शान्त कटिबन्ध’ या ‘डोलड्रम्स’ भी कहते हैं ।

  • उपोष्ण-उच्च दाब कटिबन्ध

इस पेटी का विस्तार दोनों गोलाद्र्धों में 25 से लेकर 35 अंश अक्षांशों के बीच है । विषुवतरेखीय निम्न वायु दाब कटिबन्ध की गर्म हवा हल्की होकर उत्तरी एवं दक्षिणी

ध्रुवों की ओर बढ़ने लगती है । यही हवा ठण्डी होकर 25-35 अक्षांश उत्तर एवं दक्षिण में उतरने लगती है । फलतः यहाँ वायु दाब उच्च हो जाता है । इसे ‘घोड़े का अक्षांश’ भी कहते हैं, क्योंकि प्राचीन काल में वायु दाब की अधिकता के कारण एक घोड़े के व्यापारी को अपने जहाज को बचाने के लिए यहाँ अपने घोड़े समुद्र में फेंकने पड़े थे ।

यहाँ उच्च दाब पाये जाने का कारण पृथ्वी की दैनिक गति भी है । पृथ्वी के घूमने के कारण ध्रुवों के निकट की वायु इन अक्षांशों के बीच एकत्रित हो जाती है, जिससे दबाव बढ़ जाता है ।

  • उपध्रुवीय निम्न दाब कटिबन्ध

दोनों गोलाद्र्धों में 60 से 70 अंश अक्षांश रेखाओं के निकट निम्न वायु दाब का क्षेत्र पाया जाता है । यद्यपि तापमान के अनुसार यह उच्च दाब का क्षेत्र होना चाहिए था । परन्तु यहाँ निम्न दाब पाया जाता है । ऐसा पृथ्वी के घुर्णन बल के कारण होता है । पृथ्वी की गति के कारण इन अक्षांशों पर हवाएँ फैलकर बाहर की ओर चली जाती है, जिससे यहाँ निम्न दाब बन जाता है ।

  • धु्रवीय उच्च दाब कटिबन्ध

पृथ्वी के दोनों धु्रवों को औसतन 40 प्रतिशत ही सूर्यातव प्राप्त होता है । यहाँ सूर्य की करणें काफी तिरछी पड़ती हैं । फलस्वरूप यहाँ का तापमान बहुत कम रहता है और धरातल हमेशा बर्फ से ढँका रहता है । इस प्रकार ठण्डी और भारी हवा उच्च दाब क्षेत्र का निर्माण कर देती हैं।

हवाएँ

एक स्थान से एक निश्चित दिशा को चलती हुई वायु (Air)  को हवाएँ -(Wind)  कहते हैं । यह एक प्रकार से हवा की धारा है जो उच्च दाब वायु क्षेत्र से निम्न वायु दाब क्षेत्रों की ओर चलती है । हमेशा ऐसा ही नहीं होता । हवाओं की दिशाओं को प्रभावित करने वाले कुछ प्रमुख कारक निम्न हैं:-

  • कोरिऑलिस बल

इसका नाम भूगोलवेत्ता जी.जी. कोरिऑ लिस के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने इसकी खोज की थी । इसे फेरेल का नियम भी कहते हैं । इस बल के कारण उत्तरी गोलोद्र्धीय हवाएँ प्रवर्तन की दिशा से दाँयीं ओर तथा दक्षिण गोलार्द्ध में बायीं ओर मुड़ जाते हैं। फेरेल ने सबसे पहले कहा था कि सभी गतिशील वस्तुएँ (पवन एवं धाराएँ) उत्तरी गोलार्द्ध में अपनी दाहिने ओर तथा दक्षिण गोलार्द्ध में अपनी बायीं ओर विक्षेपित हो जाती हैं । यही कारण है कि हवाएँ टेढ़े मार्ग पर चलती हैं ।

  • बॉयज बैलट नियम

यह देखा गया है कि विषुवत रेखा पर हवाओं की दिशा पृथ्वी की अक्षीय गति से लगभग नहीं के बराबर प्रभावित होती है । इसी को ध्यान में रखकर बॉयज बैलट ने अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया कि ‘‘जिस दिशा में हवा चल रही हो, यदि उस दिशा में मुख करके खड़ा हुआ जाए, तो उत्तरी गोलार्द्ध में निम्न वायु दाब बाँयी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में दाहिनी ओर होगा ।

  • घर्षण

पृथ्वी के धरातल की असमानताएँ तथा रूखापन हवाओं के दबाव में गतिरोध और अनियमितता उत्पन्न करके उसकी दिशा को प्रभावित कर देते हैं ।

हवाओं का वर्गीकरण – पृथ्वी पर बहने वाली हवाओं को मुख्य रूप से तीन बड़े भागों में बाँटा गया है – ये हैं:- पध् स्थायी पवन पपध् सामयिक पवन तथा पपपध् स्थानीय पवन ।

जैसा कि इनके नाम से ही स्पष्ट है, स्थायी हवाएँ वे होती हैं, जो सालभर चलती रहती हैं । सामयिक पवन, वे हवाएँ होती हैं, जो कुछ समय के लिए चलती हैं । जबकि स्थानीय हवाएँ, वे होती हैं, जो किसी स्थान विशेष के प्रभाव के कारण चलती हैं ।

अब हम इन तीन बड़े वर्गीकरण को विस्तार से देखेंगे –

  1. स्थायी पवन

पृथ्वी पर स्थायी रूप से स्थित उच्च दाब एवं निम्न दाब कटिबन्धों के कारण जो हवाएँ लगातार उच्च दाब से निम्न दाब कटिबन्धों की ओर चलती हैं उन्हें ‘स्थायी हवाएँ’ कहते हैं । स्थायी हवाओं के निम्न तीन प्रकार हैं –

  • व्यापारिक हवाएँ -ये हवाएँ विषुवत रेखीय निम्न दाब से उपोष्ण उच्च दाब के बीच सालभर चलती रहती हैं । इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि 30 अंश उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांशों से शून्य अंश अक्षांश की ओर वर्षभर लगातार बहने वाली हवाओं को ‘व्यापारिक हवाएँ कहते हैं । चूँकि इन हवाओं से पालयुक्त नाँव एवं जहाजों को चलाने में सुविधा होती थी, इसीलिए इन्हें व्यापारिक हवाएँ कहा गया ।

इन हवाओं के कारण पूर्वी तट पर भारी वर्षा होती है । हरिकेन नामक भंयकर तूफान इसी से संबंधित है ।

  • पछुआ हवाएँ – इन्हें पश्चिमी हवाएँ तथा विरूद्ध व्यापारिक हवाएँ भी कहा जाता है । ये हवाएँ उपोष्ण-वायु दाब कटिबन्ध से उपधु्रवीय निम्न वायु दाब कटिबन्ध की ओर चलती हैं । चूँकि ये हवाएँ प्रायः पश्चिम से चलती हैं, इसलिए इन्हें पछुआ हवाएँ कहा जाता है । अक्षांश के आधार पर कहा जा सकता है कि ये हवाएँ 30-35 अंश अक्षांशों के बीच प्रवाहित होती हैं ।

उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता के कारण पछुआ हवाएँ यहाँ अधिक जटिल हो जाती हैं । चूँकि ये हवाएँ सागरों के ऊपर से चलती है,ं इसलिए ये नमी से भरी होती हैं और महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में भारी वर्षा करती हैं ।

दक्षिण गोलार्द्ध में समुद्र की अधिकता है । इसलिए यहाँ इन हवाओं की गति बहुत तेज़ हो जाती है, इसीलिए दक्षिण गोलार्द्ध में 40 अंश अक्षांशों के बीच ये हवायें तेज़ आवाज़ करती हुई बहती हैं, जिससे इसे ‘‘गरजता हुआ चालीसा’’ कहा जाता है ।

  • धु्रवीय हवाएँ – 60 अंश-65 अंश और 90 अंश अक्षांशोंके बीच दो गोलाद्र्धों में स्थायी रूप से बहने वाली हवाओं को ‘धु्रवीय पवन’ कहते हैं ।
  1. सामयिक हवा-

जिन हवाओं में मौसम तथा समय के अनुसार परिवर्तन हो जाते हंै, उन्हें सामयिक हवा कहते हैं । ये हवाएँ निम्न प्रकार की होती हैं –

  • मानसूनी हवाएँ –

इस शब्द की उत्पत्ति अरबी शब्द ‘‘मौसीम’’ से हुई है, जिसका अर्थ है-मौसम । ये हवाएँ मौसम के अनुसार अपनी दिशाएँ बदल देती हैं । वस्तुतः ये एक प्रकार से स्थल समीर एवं जल समीर का व्यापारिक रूप ही हैं । जल एवं स्थल की स्वभावगत विशेषता के कारण इन दोनों के तापमान में अन्तर आने से हवा के दबाव में जो अन्तर आता है, वही मानसून के लिए जिम्मेदार है ।

जब सूर्य उत्तरायण में होता है, तब स्थल पर निम्न दाब और समुद्र पर उच्च दाब का क्षेत्र बन जाता है । ऐसी स्थिति में हवा महासागर से स्थल की ओर बहने लगती है । इसे ही ‘दक्षिम-पश्चिम ग्रीष्मकालीन मानसून’ कहते हैं ।

ठीक इसके विपरीत जब सूर्य दक्षिणायन हो जाता है, तब शीतकालीन उत्तरी-पूर्वी मानसूनी हवाएँ बहने लगती है । ज्ञातव्य है कि भारत में मानसूनी हवाओं द्वारा ही वर्षा होती है ।

  • समुद्रीय समीर

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह वह हवा है, जो समुद्र से धरातल की ओर बहती है । वस्तुतः होता यह है कि दिन में जल की अपेक्षा स्थल जल्दी गर्म हो जाता है । इसलिए स्थल पर निम्न दाब बन जाता है । इसके कारण समुद्र से ठण्डी हवाएँ स्थल की ओर बहने लगती हैं । समुद्र समीर प्रायः दिन में ही प्रवाहित होता है ।

  • स्थलीय समीर

यह रात को बनता है । रात में जल की अपेक्षा स्थल जल्दी ठण्डा हो जाता है । अतः समुद्र पर निम्न दाब तथा धरातल पर उच्च दाब बन जाता है । इसके कारण हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती हैं ।

  1. स्थानीय पवन –

जिन हवाओं का जन्म स्थानीय स्तर पर तापमान और वायु दाब में अन्तर के कारण होता है, उन्हें ‘स्थानीय हवाएँ’ कहते हैं । इनका प्रभाव क्षेत्र छोटा होता है तथा ये क्षोभ मंडल की निचली परतों तक ही सीमित रहती हैं।

कुछ क्षेत्रों में बहने वाले स्थानीय पवनों के नाम निम्न हैं –

  • लू – उत्तरी भारत और पाकिस्तान में.
  • शिलूक – अमेरीका एवं कनाड़ा में.
  • मिस्ट्रल – ठण्डी धु्रवीय हवा.
  • हरमटल – अफ्रीका का सहारा मरूस्थल.
  • सीयुम – अरब और सहारा रेगिस्तान.
  • ब्लिजाल्ड – हिम झंझावात (साइबेरिया, कनाड़ा और अमेरीका)

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