भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) Notes in Hindi -सविंधान सभा की माँग एवं गठन [भाग – 1]

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सविंधान सभा की माँग एवं गठन

किसी देश का संविधान उस देश की जनता को शासित करने के लिए राजनीतिक व्यवस्था का बुनियादी ढाँचा निर्धारित करता है । यह शासन के प्रमुख अंगों अर्थात औपचारिक संस्थाओं की स्थापना करता है और उसके दायित्व को निर्धारित करता है तथा शासको एवं शासितों के अन्तर्सम्बन्धों का विनियमन करता है। संविधान  एक जड़ दस्तावेज नही होता बल्कि यह निरन्तर  विकसित होने की प्रव्रत्ति के साथ सक्रिय संस्थानों की जीवन शक्ति का प्रतिरुप है।

भारतीय संविधान भारत के जन-जन की विशिष्ट सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक प्रक्रति एवं आस्थाओं पर आधारित है। भारतीय संविधान सभा द्वारा किया गया,दूसरे शब्दों में भारतीय संविधान किसी क्रान्ति का परिणाम नहीं है, अपितु जनता के मान्य  प्रतिनिधियो के निकाय का परिणाम है। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में 19वीं शताब्दी के अंतिम दशक  में सर्वप्रथम बाल गंगाधर तिलक ने स्वाराज्य विधेयक, 1895 के माध्यम से सविंधान सभा की माँग की, तत्पश्चात गाँधी जी ने 1922 में कहा कि संविधान भारतीयों की इच्छानुसार होना चाहिये, इसका यह अर्थ नहीं कि संविधान का निर्माण भारतीय जनता द्वारा किया जाय बल्कि ब्रिटिश संसद द्वारा संविधान निर्माण  करते समय भारतीय जनता के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिये।

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1924 में मोतीलाल नेहरु ने ब्रिटिश सरकार से यह मांग की थी कि भारतीय प्रतिनिधियों का एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया जाना चाहिये और सम्मेलन में तैयार की गई संवैधानिक योजना को फिर नव निर्वाचित विधान मण्डलों के सम्मुख प्रस्तुत किया जाय, जिसके अनुसार कानून बन सकें। नेहरु की यह स्पष्ट धारणा थी की किसी भी राष्ट्र के लिए उस संविधान का कोई महत्व नहीं माना जा सकता, जिसके निर्माण में उस राष्ट्र के लोगों की कोई भूमिका न हो।

भारतीय संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा के विचार का औपचारिक प्रतिपादन सर्वप्रथम एम.एन. राय द्वारा किया गया. जिसे जवाहर लाल नेहरु ने मूर्त रुप दिया। 1936 फैजपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने यह संकल्प पारित किया कि-भारतीय केवल ऐसे संविधानिक ढाँचे को मान्यता दे सकते है, जिसका निर्माण वे स्वयं कर सके।जो भारत को एक राष्ट्र मानकर देश की स्वतंत्रता पर आधारित हो और जिसमें उसकी आवश्यकताओं एवं आशाओं के अनुसार विकास की पूर्ण सम्भावना हो। कांग्रेस का उद्देश्य एक ऐसा लोकतंत्र स्थापित करना है, जिसमें राजनीतिक शक्ति का हस्तांतरण जनता को मिल सके और सरकार उसके प्रभावी नियंत्रण में हो। ऐसे राज्य की स्थापना संविधान सभा द्वारा हो सकती है, जिसका निर्वाचन वयस्क मताधिकार द्वारा हो और जिसे देश की संविधान को बनाने का अंतिम अधिकार प्राप्त हो। 1937 में कांग्रेस की सरकार वाली प्रान्तीय विधानमण्डलों में भारतीय संविधान निर्माण हेतु संविधान सभा का गठन की माँग के लिए प्रस्ताव पारित किए गए तथा 1939 में भी इसे दोहराई गयी। परिणामस्वरुप ब्रिटिश सरकार ने सर्वप्रथम अगस्त 1940 द्वारा आधिकारिक रुप से स्वीकार किया कि “भारतीयों को अपना संविधान स्वयं बनाने का अधिकार है”।

1942 में क्रिप्स मिशन की योजना को गाँधी जी नें “दिवालिया बैंक” के नाम उत्तरतिथिय चेक  तथा सरदार पटेल ने “Out date cheque” कहकर अस्वीकार कर दिया। भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के बढ़ते दबाव,द्वीतीय विश्व युध्द की बाध्यताओं एवं अन्तर्राष्ट्रीय शक्तियों के प्रभाव ने ब्रिटेन को भारतीय संविधान सभा के गठन की राष्ट्रीय माँग को स्वीक्रत करने के लिए विवश कर दिया।

कैबिटेन मिशन योजना,1946(मंत्रीमण्डलीय मिशन योजना)

मार्च 1946 में श्रमिक जल की सरकार ने(प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली) तीन सदस्यीय (पैथिक लांरेस,एबी अलेक्जेंडर तथा स्टेफर्ड क्रिप्स) कैबिनेट मिशनको भारत भेजा। मिशन 24 मार्च,1946 को दिल्ली पहुचा और 16 मई, 1946 को मिशन ने विविध राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से वार्ता के उपरान्त अपनी निम्न प्रस्तुत की-

  1. भारतीय संविधान का निर्माण करने के लिये एक संविधान सभा का गठन किया जाय।
  2. संविधान निर्माण एवं उसके क्रियान्वित होने तक अन्तरिम सरकार का गठन किया जाय।

अन्तरिम सरकार का गठन 2 सितम्बर 1946 को हुआ तथा कार्यकारी परिषद में शामिल 14 सदस्यों ने शपथ लिया। लार्ड माउन्टबेटेन कार्यकारी परिषद के सभापति तथा नेहरु उपसभापति थे।

संवीधान सभा –

इसमें कुल 389 सदस्य थे, जिसमें 93 सदस्यों को देशी रियायतों से परामर्श द्वारा आना था,04 मुख्य आयुक्त के प्रान्तों(दिल्ली,कुर्ग,अजमेर,बलूचिस्तान)से तथा 292 ब्रिटिश भारत के प्रान्तों से निर्वाचित होकर आना था।

निर्वाचन –

सार्वभौम वयस्क मताधिकार प्रत्यक्ष न होकर अप्रत्यक्ष होना था,इस प्रकार 296 सदस्यों का निर्वाचन प्रान्तीय विधानसभा सदस्यों ने किया। निर्वाचन की आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनायी गयी।

मिशन ने संविधान सभा के गठन के लिए निम्न प्रस्ताव किया-

  1. संविधान सभा में प्रत्येक प्रान्त द्वारा भेजे जाने वाले सदस्यों की संख्या का निर्धारण प्रान्त की जनसंख्या के आधार पर किया जाएगा और 10 लाख की जंनसख्या पर एक सदस्य निर्वाचित किया जाएगा।
  2. प्रान्तो के आवंटित स्थानों को उसमें निवास करने वाली प्रमुख जातियों मे उनकी संख्या के आधार पर विभाजित कर दिया जाएगा। विभाजन साधारण मुसलमान तथा सिक्ख(केवल पंजाब के लिए) के रुप में किया जाएगा।
  3. देसी रियासतों में भी 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि होगा, जिनका चुनाव समझौता समिति एवं देशी रियासतों की ओर से गठित समिति के बीच पारस्परिक विचार-विमर्श द्वारा किया जाएगा।
  4. प्रान्तों के लिए अलग संविधान का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए संविधान सभा की पहली बैठक के बाद सदस्य स्वयं को तीन संवर्गों में विभक्त कर लेगें, जो निम्न होंगें-
  • हिन्दू बहुमत वर्गों के प्रतिनिधि।
  • मुस्लिम बहुमत वासे उत्तर-पश्चिमी प्रान्तों के प्रतिनिधि।
  • मुस्लिम बहुमत वाले उत्तर-पूर्वी प्रान्तों के प्रतिनिधि।

ये तीनों संवर्गॆं अपने-अपने प्रान्तों तथा वर्गों के लिए संविधान का निर्माण करेंगे और बाद में संघीय संविधान का निर्माण किया जाएगा।

 

जुलाई 1946 में निर्वाचन हुआ, जिसमें

कांग्रेस                                208

मुस्लिम लीग                           73

यूनियनिस्ट पार्टी                         1

यूनियनिस्ट मुस्लिम                      1

यूनियनिस्ट शिड्यूल पार्टी                  1

क्रषक प्रजा पार्टी                         1

आछूत जाति संघ                        1

सिक्ख(कांग्रेस के अतिरिक्त साम्यवादी)      1

साम्यवादी                              1

निर्दलीय                               8

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296

  1. संविधान सभा में हैदराबाद देशी रियासत से कोई सदस्य शामिल नहीं था।
  2. हिन्दू महासभा का कोई सदस्य शामिल नहीं था।
  3. संविधान सभा में कुल 12 महिलाएं शमिल थी,जिसमें सर्वाधिक 4 सदस्य उ0प्र0 से थी,मद्रास से 3 थी।

इस प्रकार गठित संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर,1946 को हुआ,जिसकी अध्यक्षता डा0 सच्चिदानन्द सिन्हा ने की जो आस्थायी अध्यक्ष थे। पहली बैठक में मुस्लिम लीग ने भाग नही लिया।तत्पश्चात् नेहरु ने कहा कि यदि मुस्लिम लीग बैठक में भाग नहीं लेती तो उसे अन्तरिम सरकार से त्याग पत्र देना होगा, परिणामस्वरुप संविधान सभा की दूसरी बैठक 11 दिसम्बर,1946 को डा0 राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।जिसमें राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता का सभापति चुना गया तथा मुस्लिम लीग ने बैठक में भाग लिया।

3 जून,1947 की माउंटबेटेन योजना,जिसे बाल्कन प्लान भी कहते है, के अनुसार देश का विभाजन स्वीकार किया गया, परिणामस्वारुप संविधान सभा सदस्यों की संख्या 389 की घटकर 324 हो गयी और अन्तत: 299।

  1. 4 नवम्बर 1948 को संविधान का प्रथम वाचन प्रारम्भ हुआ। जो 9 नवम्बर 1948 तक चला।
  2. दूसरा वाचन 15 नवम्बर 1948 को प्रारम्भ हुआ जो 17 अक्टूबर 1949 तक चला।
  3. 17 नवम्बर 1949 को तीसरा वाचन प्रारम्भ हुआ जो 26 नवम्बर 1949 को अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत इस प्रस्ताव के साथ स्वाक्रत हुआ,जिसमें कहा गया कि “संविधान सभा द्वारा निर्मित संविधान को पारित किया जाय”।

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1 Comment
  1. suraj tiwari says

    sir aap hame sare anuchchhed ki jankari de

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